Friday, July 19, 2024
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सऊदी शूरा काउंसिल क्या है

सऊदी मजलिस अल-सूरा या कांसुलेट परिषद नियुक्त सदस्यों का एक निकाय है (सामान्य भाषा में इसे पार्लियामेंट और नियुक्त सदस्यों को सांसद कहा जा सकता है) जिसका प्राथमिक कार्य कानूनों का अध्ययन और प्रस्ताव करना है।

इसके बाद प्रस्तावित मामलों को किंग को प्रस्तुत किया जाता है जो यह तय करता है कि प्रस्तावित कानून को सऊदी मंत्रिपरिषद को भेजा जाएगा या नहीं।

मजलिस अल-सूरा के पास मौजूदा कानून की व्याख्या करने का अधिकार है साथ ही किंगडम के तमाम मंत्रालयों और एजेंसियों के वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट की मांग करने और ऑडिट करने का भी अधिकार है। 

मजलिस कांसुलेट परिषद राजा को समीक्षा और विश्लेषण के लिए प्रस्तुत नीतियों पर भी सलाह दे सकता है और अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर इनपुट प्रदान कर सकता है व देश की आर्थिक योजनाएं मजलिस अल-सूरा द्वारा तैयार किया जाता है।

काउंसिल के पास देश के वार्षिक बजट की समीक्षा करने और संबंधित मंत्रालयों पर सवाल उठाने व विभाग से संबंधित मंत्रियों की उपस्थिति की मांग करने का भी अधिकार है। पढ़े-सऊदी अरब 1932 से अब तक के राजाओं व ताज-राजकुमारों की सूची व इतिहास

शूरा काउंसिल तत्कालीन राजा स्वर्गीय फहद बिन अब्दुल अजीज अल-सऊद द्वारा जारी निर्देश के बाद अस्तित्व में आया था, उन्होंने 23 नवंबर 2000 को पूर्व निर्धारित सदस्यों के साथ मजलिस अल-सूरा परिषद के गठन की घोषणा की थी। 

जिसका उद्देश्य नागरिक भागीदारी के क्रमिक परिचय के माध्यम से देश को आधुनिक युग के साथ कदम से कदम मिलाना था। हालांकि शुरुआत में परिषद किसी भी अधिकार या विधि निर्माण नियम बनाने की शक्ति नहीं थी लेकिन इस कदम का समकालीन राजनीति में सकारात्मक प्रवेश के रूप में स्वागत किया गया था।

शूरा काउंसिल अपने पहले कार्यकाल में 60 सदस्यों और शूरा काउंसिल परिषद (पार्लियामेंट) अध्यक्ष को तात्कालिक राजा द्वारा नियुक्त किया गया था। 

दूसरे कार्यकाल में, इनके सदस्यों की संख्या बढ़कर 90 कर दी गयी थी, फिर निम्नलिखित अवधि में 120 सदस्यों और अंत में 150 सदस्य निर्धारित कर दिया गया है। शूरा परिषद (पार्लियामेंट) का कार्यकाल चार वर्ष का होता है। पढ़े-खाड़ी सहयोग परिषद & GCC का गठन व उद्देश्य

परिषद के चौथे कार्यकाल में 30 महिला सदस्यों को शामिल किया गया था जिसकी संख्या 20% थी। यह स्वर्गीय राजा शाह अब्दुल्ला (शासनकाल 2005-2015) के सऊदी आधुनिकीकरण के प्रयासों के माध्यम से संभव बनाया गया था जिन्होंने पहली बार सन् 2011 घोषणा की थी कि शूरा परिषद में महिलाओं को नियुक्त करने की योजना बना रहे हैं।

सऊदी महिलाओं को सशक्त बनाने व प्रगतिशील रुख के लिए जाने जाने वाले किंग ने उस समय यह भी कहा कि उनकी महिलाओं को वोट देने और 2015 के नगर निकाय के चुनावों में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की अनुमति होगी। 2013 में उनकी बातें हकीकत बन गईं जब 30 महिला सदस्यों को शूरा काउंसिल परिषद में सदस्य के रूप नियुक्त किया गया और उनकी शपथ कराई गई थी। पढ़े-GOSI सऊदी अरबीया, सब कुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है

शाह अब्दुल्ला ने शूरा काउंसिल परिषद की भूमिका को विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शूरा काउंसिल परिषद (पार्लियामेंट) में 30 महिलाओं की नियुक्ति कर उन्होंने किंगडम के भीतर समाज सुधार के एक नए युग के सुरुवात का बिगुल बजा दिया था।

तात्कालिक किंग ने शूरा काउंसिल के वार्षिक अधिवेशन में कहा था हम शरीयत का पालन करने वाली सभी भूमिकाओं में महिलाओं को हाशिए पर रखने से इनकार करते हैं। उन्होंने कहा कि उनका यह फैसला प्रमुख धार्मिक विद्वानों के साथ बातचीत पर आधारित है। उन्होंने कहा था सभी प्रमुख धार्मिक विद्वानों ने शरीयत के अनुसार परिषद भाग लेने के लिए महिलाओं को शामिल करने की मंजूरी दी है। उन्होंने कहा कि महिला सदस्या अपने पूर्ण अधिकारों का आनंद और अपने कर्तव्यों, जिम्मेदारियों के प्रति प्रतिबद्ध होंगी। 

सऊदी महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में यह कदम बहुत महत्वपूर्ण था और लंबे समय तक बंधे बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में एक बड़ा सराहनीय कदम था।

2003 में तत्कालीन राजा शाह अब्दुल्ला ने राष्ट्रीय संवाद केंद्र (Center for National Dialogue) की स्थापना की थी। जिसका मिशन “जिम्मेदार अभिव्यक्ति के लिए एक चैनल बनाना था। 

अपनी प्रारंभिक अवस्था में, शूरा परिषद को अक्सर जनता द्वारा लोगों की जरुरतों और आकांक्षाओं के प्रति उदासीन होने का आरोप लगाया जाता था। निर्विवाद रूप से धार्मिक सिद्धांत का एक प्रमुख विषय था जो परिषद द्वारा किसी भी सही मायने में प्रगतिशील कदम के लिए प्रकट हुआ था। पढ़ेसऊदी अरब का इज़ार (Ejar) किराया सिस्टम / गाइड-लाइन व अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शूरा काउंसिल में महिलाओं के प्रथम कार्यकाल के अंत में एक सक्रिय महिला सदस्य और कवि, थुरैय्या अल-अराइद ने कहा कि “जब महिला पहली बार परिषद में शामिल हुईं थीं तो न केवल परिषद में बल्कि सऊदी जनता के बीच भी विविध राय थी। जनता में कुछ ऐसे लोग भी थे जो निराशावादी थे। 

शूरा काउंसिल लोगों की जरूरतों का प्रतिनिधित्व करने और निरंकुश राजशाही पर शूरा काउंसिल वर्तमान में सबसे बेहतर भूमिका निभा रहा है जो एक स्वस्थ राज्यतंत्र के लिए शुभ कहा जाएगा। यह पार्लियामेंट रबर स्टैम्पिंग सरकार के फैसलों की तुलना में बेहतर दिखाई देता है वर्तमान में किंगडम की नीतियों पर सवाल उठाने और जवाब मांगने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

फिलहाल सऊदी अरब के संविधान में उनकों बदलाव किए जा रहे है इसी क्रम में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को सऊदी अरब का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया है। 

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