सऊदी शूरा काउंसिल

मजलिस अल-सूरा या कांसुलेट परिषद नियुक्त सदस्यों का एक निकाय है (सामान्य भाषा में इसे  पार्लियामेंट और नियुक्त सदस्यों को सांसद कहा जा सकता है) जिसका प्राथमिक कार्य कानूनों का अध्ययन और प्रस्ताव करना है।

इसके बाद प्रस्तावित मामलों को राजा को प्रस्तुत किया जाता है जो यह तय करता है कि प्रस्तावित कानून को सऊदी मंत्रिपरिषद को भेजा जाएगा या नहीं।

मजलिस अल-सूरा के पास मौजूदा कानून की व्याख्या करने का अधिकार है, साथ ही किंगडम के तमाम मंत्रालयों और एजेंसियों के वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट की मांग करने और ऑडिट करने का भी अधिकार है। मजलिस कांसुलेट परिषद राजा को उनकी समीक्षा और विश्लेषण के लिए प्रस्तुत नीतियों पर भी सलाह दे सकता है और अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर इनपुट प्रदान कर सकता है व देश की आर्थिक योजनाएं मजलिस अल-सूरा द्वारा तैयार किया जाता है।

काउंसिल के पास देश के वार्षिक बजट की समीक्षा करने और संबंधित मंत्रालयों पर सवाल उठाने व विभाग से संबंधित मंत्रियों की उपस्थिति की मांग करने का भी अधिकार है। पढ़े-सऊदी अरब 1932 से अब तक के राजाओं व ताज-राजकुमारों की सूची व इतिहास

शूरा काउंसिल तत्कालीन राजा स्वर्गीय फहद बिन अब्दुल अजीज अल-सऊद द्वारा जारी निर्देश के बाद अस्तित्व में आया था, जिन्होंने 23 नवंबर 2000 को पूर्व निर्धारित सदस्यों के साथ मजलिस अल-सूरा परिषद के गठन की घोषणा की थी। किंगडम के मामलों में नागरिक भागीदारी के क्रमिक परिचय के माध्यम से देश को आधुनिक युग के साथ कदम से कदम मिलाना था। हालांकि शुरुआत में परिषद किसी भी अधिकार या विधि निर्माण नियम बनाने की शक्ति से रहित थी, लेकिन इस कदम का समकालीन राजनीति में सकारात्मक प्रवेश के रूप में स्वागत किया गया था।

शूरा काउंसिल अपने पहले कार्यकाल में, 60 सदस्यों और शूरा काउंसिल परिषद (पार्लियामेंट) अध्यक्ष को तात्कालिक राजा द्वारा नियुक्त किया गया था। दूसरे कार्यकाल में, इनके सदस्यों की संख्या बढ़कर 90 कर दी गयी थी, फिर निम्नलिखित अवधि में 120 सदस्यों और अंत में 150 सदस्य निर्धारित कर दिया गया है। शूरा परिषद (पार्लियामेंट) का कार्यकाल चार वर्ष का होता है। पढ़े-खाड़ी सहयोग परिषद & GCC का गठन व उद्देश्य

परिषद के चौथे कार्यकाल में 30 महिला सदस्यों को शामिल करना था जिसकी संख्या 20% थी। यह स्वर्गीय राजा शाह अब्दुल्ला (शासनकाल 2005-2015) के आधुनिकीकरण के प्रयासों के माध्यम से संभव बनाया गया था, जिन्होंने पहली बार सन् 2011 घोषणा की थी कि वह में शूरा परिषद में महिलाओं को नियुक्त करने की योजना बना रहे हैं।

सऊदी महिलाओं को सशक्त बनाने व प्रगतिशील रुख के लिए जाने जाने वाले राजा ने उस समय यह भी कहा कि उनकी महिलाओं को वोट देने और 2015 के नगर निकाय के चुनावों में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की अनुमति होगी। 2013 में, उनकी बातें हकीकत बन गईं जब 30 महिला सदस्यों को शूरा काउंसिल परिषद में सदस्य के रूप नियुक्त किया गया और उनकी शपथ कराई गई थी। पढ़े-सऊदी अरब के 10 सबसे अमीर व्यक्ति

शाह अब्दुल्ला ने परिषद की भूमिका कों विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शूरा काउंसिल परिषद (पार्लियामेंट) में 30 महिलाओं की नियुक्ति कर उन्होंने किंगडम के भीतर समाज सुधार के एक नए युग के सुरुवात का बिगुल बजा दिया था।

तात्कालिक राजा ने शूरा काउंसिल के वार्षिक अधिवेशन में कहा था, हम शरीयत का पालन करने वाली सभी भूमिकाओं में महिलाओं को हाशिए पर रखने से इनकार करते हैं। उन्होंने कहा कि उनका यह फैसला प्रमुख धार्मिक विद्वानों के साथ बातचीत पर आधारित है। उन्होंने कहा था सभी प्रमुख धार्मिक विद्वानों ने शरीयत के अनुसार परिषद भाग लेने के लिए महिलाओं को शामिल करने की मंजूरी दी है। उन्होंने कहा कि महिला सदस्या अपने पूर्ण अधिकारों का आनंद, और अपने कर्तव्यों, जिम्मेदारियों के प्रति प्रतिबद्ध होंगी। पढ़े-सऊदी अरब ग्रीन कार्ड निवास परमिट आवेदन प्रक्रिया

सऊदी महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में यह कदम बहुत महत्वपूर्ण था और लंबे समय तक बंधे बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में एक बड़ा सराहनीय कदम था।

2003 में, तत्काली राजा शाह अब्दुल्ला ने राष्ट्रीय संवाद केंद्र (Center for National Dialogue) की स्थापना की थी। जिसका मिशन “जिम्मेदार अभिव्यक्ति के लिए एक चैनल बनाना था। 

अपनी प्रारंभिक अवस्था में, शूरा परिषद को अक्सर जनता द्वारा लोगों की जरुरतों और आकांक्षाओं के प्रति उदासीन होने का आरोप लगाया जाता था। निर्विवाद रूप से धार्मिक सिद्धांत का एक प्रमुख विषय था जो परिषद द्वारा किसी भी सही मायने में प्रगतिशील कदम के लिए प्रकट हुआ था। पढ़े-सऊदी अरब वीज़ा के प्रकार व आवेदन प्रक्रिया

शूरा काउंसिल में महिलाओं के प्रथम कार्यकाल के अंत में, एक सक्रिय महिला सदस्य और कवि, थुरैय्या अल-अराइद, ने कहा कि “जब महिला पहली बार परिषद में शामिल हुईं थीं तो न केवल परिषद में बल्कि सऊदी जनता के बीच भी विविध राय थी। जनता में ऐसे लोग भी थे जो निराशावादी थे।

शूरा काउंसिल लोगों की जरूरतों का प्रतिनिधित्व करने और निरंकुश राजशाही पर, शूरा काउंसिल वर्तमान में सबसे बेहतर भूमिका निभा रहा है जो एक स्वस्थ राज्यतंत्र के लिए शुभ कहा जाएगा। यह संगठन रबर स्टैम्पिंग सरकार के फैसलों की तुलना में बेहतर दिखाई देता है, वर्तमान में किंगडम की नीतियों पर सवाल उठाने और जवाब मांगने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पढ़े-एक्ज़िट री-एंट्री वीज़ा चेक करने का आसान तरीका

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